
“कितना खूबसूरत मौसम है…”
अनाया बालकनी में खड़ी मुस्कुरा उठी थी।
नैनीताल की ठंडी हवा उसके खुले बालों को बार-बार चेहरे पर बिखेर रही थी। सामने दूर तक फैले हरे पहाड़ बादलों की हल्की चादर में ढके हुए थे। नीचे झील के किनारे जलती पीली लाइट्स शाम को और जादुई बना रही थीं।
जिस होटल में वे ठहरे थे, वह किसी सपने जैसा लग रहा था। लकड़ी की बनी बड़ी-बड़ी बालकनियाँ, हल्की पीली रोशनी, और हवा में घुली बारिश की मिट्टी की खुशबू…
अनाया ने गहरी साँस ली थी।
“ऐसा मौसम हो… तो किसी को भी इश्क हो जाए,” वह खुद से बुदबुदाई थी।
“वैसा ही मैं सोच रहा था…”
अचानक बगल वाली बालकनी से किसी मर्दाना आवाज़ ने कहा था।
“आपसे तो किसी को भी इश्क हो जाए।”
अनाया चौंककर तुरंत पलटी थी।
साइड वाली बालकनी में खड़ा एक नौजवान बेहद दिलचस्प मुस्कान के साथ उसी को देख रहा था। काली शर्ट, हल्की बढ़ी दाढ़ी, और आँखों में अजीब सा सुकून… मगर उसे देखते ही अनाया के चेहरे का रंग उड़ गया था।
वह आराम से रेलिंग पर हाथ टिकाए उसे देख रहा था, जैसे उसे वहीं मिलने की उम्मीद थी।
“कैसी हैं आप?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा था।
अनाया ने तुरंत नजरें फेर ली थीं।
“मुझे अजनबियों से बात करने का शौक नहीं है,” उसने जल्दी से कहा और अंदर आ गई थी।
मगर उसके कदमों में घबराहट साफ थी।
“हम एक-दूसरे के लिए अजनबी कब से हो गए?”
अभिराज ने जानबूझकर थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा था।
अनाया ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह आकर सीधे बेड पर बैठ गई थी और अपना सिर पकड़ लिया था।
उसका दिल बहुत तेज धड़क रहा था।
जिस इंसान को भूलना चाहती थी। वह चाहती थी कि वह एक रात उसकी जिंदगी से गायब हो जाए…
वह उसे यहाँ मिल जाएगा… उसने कभी सोचा भी नहीं था।
“अब मैं क्या करूँ…” उसने परेशान होकर आँखें बंद कर ली “मैं उसे जानती ही नहीं… मुझे कुछ याद नहीं है…”
अनाया ने खुद को समझाने की कोशिश की थी।
वह अपने ही दिल को झूठा कॉन्फिडेंस दे रही थी।
“मैं सब से मुकर जाऊँगी…”
मगर ऐसा करना उसके लिए आसान नहीं था।
उसने अभी-अभी अभिराज का चेहरा देखा था… और उसके चेहरे पर वही शरारती मुस्कान थी। उसे सब याद था। जैसे उसे पता हो कि अनाया उससे झूठ बोलने वाली है।
अनाया को खुद पर बेहद पछतावा हो रहा था।
“हे भगवान… मैंने आखिर क्यों किया वो सभ उस रात…” उसने आँखें बंद कर ली थीं।
मगर अब पछताने से क्या हो सकता था?
असल में वह अपनी बड़ी बहन की शादी के लिए यहाँ आई थी। दोनों फैमिलीज़ ने नैनीताल में destination wedding प्लान की थी।
जिस रिजॉर्ट में शादी होनी थी, वह बेहद खूबसूरत था। पहाड़ों के बीच बना लकड़ी का शानदार resort… चारों तरफ हरियाली, ठंडी हवा और बादलों से ढकी वादियाँ।
ये पूरा रिजॉर्ट लड़के वालों का ही था। इसलिए उन्होंने शादी भी यहीं रखने का फैसला किया था।
अनाया अब तक विदेश में पढ़ रही थी, इसलिए वह लड़के वालों की फैमिली को ज्यादा नहीं जानती थी। वह सिर्फ अपने होने वाले जीजा जी को जानती थी।
कुछ ही दिनों पहले वह वापस इंडिया आई थी… और मुंबई की भागती-दौड़ती जिंदगी से दूर ये जगह उसे किसी सुकून जैसी लगी थी।
वह यहाँ आकर बेहद खुश हुई थी।
उसे लगा था कि आखिरकार उसे थोड़ी शांति मिलेगी।
मगर अनाया ये नहीं जानती थी कि उसकी सारी शांति छीनने वाला इंसान उससे पहले ही वहाँ पहुँच चुका है।
“नहीं स्वीटी… कमजोर मत पड़।”
अनाया ने खुद को समझाया था।
“तू उसे पहचानती ही नहीं है। जब तू उसे पहचान नहीं पाई… तो बाकी बातें भी कैसे याद होंगी?”
उसने खुद को बहुत अच्छे से समझा लिया था।
मगर बेचारी अनाया ये नहीं जानती थी… कि सामने वाला इंसान कौन था।
और पीछा छोड़ना उसे बिल्कुल नहीं आता था।
बिजनेसमैन अभिराज सिंह राठौड़।
ज़िंदगी में पहली बार उसे कोई लड़की पसंद आई थी… और अब वो लड़की उसे आखिर मिल गई थी।
पिछले दो महीनों से वह उसी को ढूँढ रहा था।
उसे अब तक ये भी नहीं पता था कि अनाया यहाँ किसलिए आई है। वह तो बस अपनी माँ की ज़िद पर शादी में शामिल होने आया था।
वरना अभिराज उन लोगों में से था जो बिजनेस ट्रिप्स, मीटिंग्स और deals में इतना उलझा रहता था कि फैमिली फंक्शन्स तक में मुश्किल से पहुँचता था।
उसने तो साफ कह दिया था कि वह सीधे शादी के टाइम आएगा।
मगर उसकी माँ की ज़िद उसे पहले ही नैनीताल खींच लाई थी।
और अब उसे लग रहा था… उसका यहाँ आना बिल्कुल बेकार नहीं गया।
क्योंकि जिस लड़की को वह दो महीनों से ढूँढ रहा था…
वो उसके बगल वाले कमरे में ठहरी हुई थी।
और अनाया…
जो पिछले दो महीनों से उस रात को भूलने की कोशिश कर रही थी…
वो अब उसके सामने खड़ा था।
बस एक बालकनी की दूरी पर।अभिराज बहुत खुश था।
जो आदमी कुछ देर पहले तक बेहद खराब मूड में घूम रहा था… अब उसके चेहरे पर अलग ही मुस्कान थी।
वह बस उसे देखकर लौटा था… और अब उसका कहीं जाने का मन ही नहीं कर रहा था।
असल में उसने पहले ही कह दिया था कि वह सिर्फ बीच में एक बार आएगा और फिर वापस चला जाएगा। शादी के सारे functions एक साथ नहीं होने थे। पूरे एक महीने तक अलग-अलग रस्में चलने वाली थीं।
यहाँ सिर्फ बहुत करीबी guests आने वाले थे, इसलिए पूरा रिजॉर्ट उन्हीं के लिए बुक किया गया था।
मगर अब…
अभिराज के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।
उसने कुछ सोचकर हल्का सा मुस्कुराया था।
“अब तो कहीं नहीं जा रहा मैं…” उसने खुद से कहा था।
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उधर अनाया बेहद खराब मूड के साथ अपने कमरे में लेटी हुई थी।
उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि अभिराज उसे यहाँ इस तरह मिल जाएगा।
और अभी तो वह ये भी नहीं जानती थी कि वो आदमी आखिर है कौन।
जब उसे पता चलेगा कि अभिराज सिंह राठौड़ कौन है… तब उसे और बड़ा झटका लगने वाला था।
शाम तक सभी मेहमान पहुँच चुके थे। आते ही सबके कमरों में चाय, कॉफी और snacks भेज दिए गए थे ताकि सब आराम कर सकें।
ऐसे मौसम में भला कौन बालकनी में बैठना मिस करना चाहता?
मगर अनाया अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकली थी।
वह तो बालकनी तक में नहीं गई… कहीं फिर से उसका सामना अभिराज से ना हो जाए।
रात का खाना नीचे hall में रखा गया था। लॉन और hall दोनों तरफ हल्की-हल्की decoration और arrangements शुरू हो चुके थे। आज माहौल शांत था… मगर कल से संगीत और बाकी functions का शोर शुरू होने वाला था।
अनाया का तो नीचे जाने का भी मन नहीं था।
मगर तभी उसकी बड़ी बहन इशिता कमरे में आ गई थी।
“क्या हुआ तुम्हें?” उस ने आते ही पूछा था, “मुझे लेने आना पड़ा। चलो नीचे।”
और फिर बिना उसकी बात सुने उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर ले जाने लगी थी।
“दीदी…” अनाया ने मुँह बनाया था, “आप जीजू के साथ रहो ना… मुझे क्यों disturb कर रही हो?”
“अच्छा?” वो हँसी थी, “क्या हुआ? इतनी खुश थी तुम यहाँ आकर… अब अचानक मूड क्यों खराब हो गया?”
“न-नहीं…” अनाया ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा था, “मैं तो बहुत खुश हूँ। आपकी शादी है… मैं उदास कैसे हो सकती हूँ?”
मगर ये कहते हुए उसका चेहरा फिर उतर गया था।
और इशिता ने ये बात notice कर ली थी।
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